Friday, September 25, 2009

नव रात्र पूजा का तमाशा

नव रात्र पूजा का तमाशा
माँ दुर्गा की पूजा का पर्व नवरात्र हर साल मनाया जाता है पूजा करना या अपने धर्म में आस्था रखना अच्छी बात है पर आस्था के नाम पर जो तमाशा व नाटक होता है वह ठीक नहीं है सोचिये की हर साल दुर्गा पूजा के नाम पर कितनी विजली व धन का दुरपयोग होता है हम उसे रोकने की दिशा में कोई आवाज़ क्यों नहीं उठाते अगर हम चाहे तो पुरे शहर में एक स्थान पर मना कर करोडो रुपया बचा कर किसी अच्छे काम में लगा सकते है जितना रुपया हम सजावट में फूकते है उतने में तो कई लड़कियों की शादी हो सकती है कई परिवारों को कई माह तक भोजन मिल सकता है अगर ३ साल हम ऐसा करले तो अपने आस पास कोई फैक्ट्री लगा कर सैकडो लोगो को रोजगार दे सकते है जो की सच्ची पूजा होगी लेकिन ऐसा कब होगा .....माँ भगवती अपने भक्तो को सदबुधि दे..

Wednesday, September 23, 2009

hoosla nahi melta

लोग कहते हैं ज़मीं पर किसी को खुदा नहीं मीलता
शायद उन लोगों को दोस्त कोई तुम-सा नहीं मिलता
किस्मतवालों को ही milati है पनाह कीसी के dil में
यूं हर शख़्स को तो जन्नत का पता नहीं milata
अपने सायें से भी ज़यादा यकीं है मुझे तुम पर
अंधेरों में तुम तो mil जाते हो, साया नहीं milata
इस बेवफ़ा zindagi से शायद मुझे इतनी मोहब्बत ना होती
अगर इस ज़िंदगी में दोस्त कोई तुम जैसा नहीं milata
मानता हूँ कुछ गम मैंने दोस्तों से छुपाए हैं
कहना चाहता हूँ मगर kya करूँ हौसला नहीं मिलता

Saturday, September 19, 2009

dil ki zuban

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना

मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना

दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना

सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला

Friday, September 18, 2009

पत्रकार

पत्रकार लोकतंत्र का इक, अभिन्न अंग है,
पत्रकार।
नाम कलम से,
काम कलम से,
है ,युग निर्माता पत्रकार।
हिंसा और आतंक मिटाने की,चेष्ठा है पत्रकार।
घटनाओं का आंखों देखा,लेख है, लिखता पत्रकार।
जन-जन तक ख़बरें पहुंचाकर,दायित्व निभाता पत्रकार।
दिखता नही सुबह का सूरज,फिर कलम पकड़ता पत्रकार।
अविलम्बित ये मानव ऐसा ,बेबाक टिप्पणी पत्रकार।
ये भी एक विडम्बना है, आतंकित है पत्रकार।
हो जाए चाहे जो कुछ भी,पर निडर व्यक्ति है पत्रकार।
समय अनिश्चित, कार्य अनिश्चित,पर निश्चित है, पत्रकार।
एक सिपाही बंदूको, से एक सिपाही कमलकार,लोकतंत्र का पत्रकार,
ये लोकतंत्र का पत्रकार।
कुंवर समीर शाही