जीवन वैतरणी में चलते हुए
एक दिन
संवेदनाएँ मरने लगीं
भावनाएँ आहत होने लगीं
साथ जो कभी अपना था
बेमानी लगने लगा
ख़ुद अपनी लाश
ढोने से अच्छा है
रास्ता बदल लिया जाए
दो छत्ती से अरमान उतार
बिखरे आत्मसम्मान की पोटली लिए
आशा की पगडण्डी
पर चल निकली
हवा के तीर
राहों में पड़े शब्द
पांव छिलते रहे
पर थामे सूरज का हाथ चलती रही
हजारों उँगलियाँ मेरी ओर थीं
कटाक्ष के बवंडर
आँखों में चुभे
रूह तक नंगा करते रहे
गर्द के गुबार में
खुद को छुपाती में चलती रही
कुलछनी, कुलटा, व्यभिचारिणी
ऐसी संज्ञाओं के पत्थर
मुझ पर बरसते रहे
मेरी घायल अस्मिता
दरद से तड़प उठी
पर स्वयं अपने सहारे
मैं चलती रही
इस पीड़ा में
मधुरता का अहसास लिए
शुभ लक्षण का
मुझमें प्रादुर्भाव हुआ
एक औरत
इन उल्काओं का सामना कर भी ले
पर माँ ..............नहीं
बिखरे जिस्म के टुकडों को समेट
रक्तरंजित पैरों से
स्वाभिमान को कुचलती
स्वयं से स्वयं को हारती
ममता को आगोश में लिए
मैं वापस मुड़ गई।
Sunday, March 21, 2010
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